Friday, October 10, 2014

आज सुबह का पेपर जब खोला तो हेड लाइन थी पाक को चुकानी पड़ेगी कीमत और फोटो में इक भारतीय महिला अपने टूटे पड़े माकन की ईंटे सहेज रही थी.
समझ  में नहीं आया, कौन कीमत चूका रहा है.
भगवान ने चोंच दी  है, इसका अलग अलग उपयोग है,
दिन भर टीवी पे चिपिर चिपिर करने के बजाय अगर इस चोच का उपयोग सार्थक बातचीत में लगाया जय तो नागरिको का भला हो।

Friday, May 9, 2014

बड़ी नदी, बड़े लोग और छोटी नदी ,छोटे लोग

बड़ी नदियों का अपना इतिहास रहा है .लोग बाग़ बसते गए शहर बसता गया. जब पानी का स्रोत नदिया ही थी तब  सुबह  नदियों के किनारे शाम नदियों के किनारे. यही घाटो के विकास की कहानी बताते है जितना  पुराना शहर उतने पुराने घाट. स्नान के बाद ध्यान की जरूरत ने घाट के पास छोटे बड़े मंदिरो का विकास हुआ. धीरे शहर फैलता गया घाट ऐतिहासिक बनते गए.
आज फिर नदी घाट चर्चा में है . न मो की वजह से या ऐ के की वजह से, लेकिन फिर इक बार नदी , घाट, या यु कहे बनारस चर्चा में है .
बहुत बिचित्र बात है जितने भी देव हुए इन बड़ी नदियों के किनारे . राम सरयू के किनारे, तो कृष्णा यमुना के किनारे और तो और महादेव ने गंगा किनारे अपनी नगरी बसाई. बड़ी नदियों  बड़ी गाथाये और इन्ही के बीच देवताओ ने अपने अस्तित्व तो व्यापक बनाया.
राम कृष्णा और महादेव के वजह से ये नदिया इतनी महान बनी या इन नदियों के कारण  ये देव स्थापित  हुए, इनकी लीलाये सदियों तक सहेजे गयी, ये अपने आप में चर्चा का विषय है . लेकिन प्रशन तो ये उठता हही है की किन कारण से इन विभूतियों ने इन नदियों को अपनी कार्य स्थली  चुनी. अगर ये ही देवता गंडक , टोंस, राप्ती, गोर्रा, घाघरा और न जाने ऐसे कितने ही छोटी और चीनी मिल का सेवेर लाइन बन चुकी नदियों के किनारे अपनी उपस्थिति दर्ज करते तो ये नदिया अपना महत्व रखती. मगर ऐसा हो न सका, और इसके के लिए किसी देवता को दोष कैसे दे सकते है . भई वे तो देवता है उनका क्या , वे कही भी अपनी लीला करे.मगर यदि इनमे से किसी ने भी कबीर के तरह सहस दिखाया होता तो न जाने कितने शापित मगहर का तारण हुआ होता.
अगर ये साहस न मो ने या ऐ के ने दिखाया होता तो लोग सदियों तक मिसाल देते. प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार, वो भी जिसकी लहर चल रही हो, कही से लड़ता जो जीत ही जाता, फिर बनारस ही क्यों? थोड़ा सीना और चौड़ा कर के किसी छोटी नदी के किनारे पहुंचे होते तो उसका भी उद्धार हुआ होता.

Thursday, May 8, 2014

इक कहानी कुछ सुनी सी

एक मगरुर राजा था बड़ा ही शौकीन . उसने एक बार एक नामी दर्जी को बुलाया और कहा ऐसी पोशाक बनाओ जो कोई भी ना पहने मिले और एकदम अलग हो वरना तुम्हारा सिर कलम कर दूंगा.
दर्जी काफी सोचने के बाद बोला कल तक का वक्त दो बना दूंगा.
अगले दिन दर्जी आया और राजा को बोला ये लो हुजूर एसी पोशाक जो हवा से बनी है, इस हवाई पोशाक को पहने. ऐसा कहकर राजा के नंगे शरीर पर हाथ फेरा और कहा अब पोशाक जच रही है हुजूर.
राजा पुरी नगरी नंगा ही घुमा ओर सब तारीफ किए जा रहे. किसी की हिम्मत नही हुई की उसे बता दें कि कितनी जलालत भरा वाकया है ये .
तभी एक बच्चा आया और जोर जोर से हंसते हुए बोला राजा नंगा घुम रहा है.
बस राजा को रास नही आया ओर कहर ढा दिया बच्चे पर.
आज भ्रष्टाचार रूपी राजा हमारे सामने नंगा घुम रहा है और एक बच्चे ने हकीकत का अहसास करवाया तो ...कहर शुरू................


"बच्चा" राहुल बाबा को बिलकुल भी न समझे ..............
ये  तो आम आदमी है .........
साँच  बराबर  तप  नहीं  झूठ  बराबर  पाप
जाके  हिरदय  साँच  है  ताके  हिरदय  AAP

Wednesday, May 7, 2014

जात ना पूछो नेता की

दौर वो भी था जब जात पात तो थी .......
लेकिन नेता जात नहीं बताते थे
जरुरत ही ना थी .....
अपना राष्ट्रीय चरित्र बनाने में जात की क्या जरूरत ........
गांधी की क्या जात ?
लोहिया की ........
आचार्य नरेंद्र  देव की क्या जात है ........
राजेंद्र बाबू , कृपलानी, सुभाष बाबू और ना जाने कितने तमाम नेता जिनको अपनी जात बताने की जरूरत ही नहीं थी.
दौर आज है की किसी ने तोहमत लगा दी की नीच राजनीति हो रही है तो राष्ट्रीय चरित्र की पार्टी के तथा कथित राष्ट्रीय नेता अपनी नीची जाती का परिचय देने लगे .
अरे साब जातिया कोई नीची नहीं होती है
नेता बंधू लोगो ने कोई मौका नहीं छोड़ा है
अब लोहिया के नाम पे समाजवादी व्यापारी सभा कार्यक्रम करती है
तो लोगो पता चलता है की लोहिया बनिया थे...
वणिक समाज के कार्यक्रम में गांधी भी बनिया हो गए...........
जब कायस्थ महासभा अपने सालाना कार्यक्रम में राजेंद्र बाबू की फोटो लगाती है तो लोगो को ध्यान आता है की बाबू जी कायस्थ है..
लेकिन आज तो होड़ सी लगी है नेताओ में अपनी जात बताने में .........
ये सिद्ध करता है की नेता की स्वीकारोक्ति इतनी सिमित हो गयी है की जात बताये बिना काम नहीं चलेगा ....
ना ही कोई सैद्धांतिक सोच है ना ही सिद्धांत के आधार पे संघठन ....
भैया जात बिना काम नहीं चलेगा
अरे दद्दा जब इतनी लहर है तो का जरूरत है अपनी जात बताने की
खैर १६ मई का इन्तजार है .......
की जात काम आता है की  नाम काम आता है या फिर संघर्ष काम आता है

Thursday, May 1, 2014

चुनाव की गर्मी या गर्मी मे चूनाव

भैया बहुत गर्मी है.
पारा है कि रुकने का नाम नही  ले रहा  है और इस गर्मी मे नेता भाई लोग और भी गर्मी झाड़ रहे है.
कल लालू छपरा मे मोदी, नीतीश पे गर्मीं उतर रहे थे.
प्रियंका अमेठी मे, अबु आजमी पूर्वांचल मे.
का हो गया है सबको ।
ऐसे ही बहुत गर्मी है भाई
काहे को और बढ़ा रहे है........
कल टीवी पर देखा कि अच्छे दिन आने वाले है.……
अभी तो लग नहि रहा
शायद १६ मई के बाद……… राम जाने
मौसम विभाग वाले भी अब नईं  सरकर पे हि भविष्यवादी करेंगें
तब तक तो ऐसे हि चलेगा

Wednesday, April 30, 2014

गहमर में प्राइम टाइम

चुनावी चक्कलस में गहमर और लमही कुछ ओहींगा लागल
 जैसे मई जून की दुपहरिया में आम के बगिया की छाव.
दुबे जी तो कमाल के व्यक्तित्व है.
 आजुओ  कुछ लोग बा जे बिना किसी मेवा के सेवा में लागल  बा.
वार्ना गाव देहात में भी अब शहरी संस्कृति आ चुकल ह.
कुछ मिली तबे करब नाही त हमरा के कौन अकाज बा.
रवीश बाबू पूर्वांचल में ई गर्मी में माइक लेके गाव देहात में खाक छानत बाटे.
नीक लागल.
गहमर में अगर ६० सेकेंड  अगर भोला नाथ गहमरी भी कवर होते त और मज़ेदार होत.
बाकी 50  मिनट में का का दिखावे.
अच्छा है. 

Wednesday, April 23, 2014

इस चुनाव में सोच रहा हु दंखिणपंथी बन जाऊ.
बहुत महगाई है, बहुत बेरोजगारि. 
बहुत कोशिश भी की.
नहीं बन प् रहा.
जब भी देखता हु रजत शर्मा को भावी प्रधानमंत्री को महामहिम बनाते तो संघी नही बन पता.
आज का युवा  बदलाव चाहता है, मै  भी युवा हु  मै भी बदलाव चाहता हु. लेकिन कैसे बदल जाऊ.
मेरा  भावी नेता बहुत डरपोक है, 
शायद उसकी वजह से ही मै बदल नहीं पा रहा.
कल ABP NEWS पे मोदी को तीन पत्रकारों के सामने GHOSNAPATRA में देखा।
बहुत दुःख हुआ, मेरा भावी नेता जिसके लहर में मैं बाप दादा की तालीम छोड़ संघी बनने चला था वो 3 से ज्यादा पत्रकार लोग से डरता है.
यही सवाल मैंने अपने संघी मित्र से किया, जवाब था रजत के प्रोग्राम में तो पब्लिक थी.
मैंने मन में कहा पब्लिक थी या पार्टी कार्यकर्ता जो हर हर मोदी कह रहे थे.
लेकिन मैं ये कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
वरना लोग बाग़ मेरे को आप का समर्थक  मान बैठेंगे।
भैया जगदम्बिका पाल जी से सिखने पड़ेगा 30  साल कांग्रेस का झंडा ढो कर संघी कैसे बनते है.


Thursday, April 17, 2014

जब पत्रकार ही समाज को जातियों की सीमा में बांध कर रिपोर्टिंग करेगा तो जनता में ये भावना पहले से बलवती है. आप शायद इस भावना को और बढ़ाने में मदद कररहे है जाने या अनजाने ही.
लम्बा लेख नहीं लिखना चाहता, बस यही कहना चाहता हु की जितना पार्टियां जातीयता फैलाती है मीडिया का भी उतना ही रोल है. चुनाव के शुरू होते ही अखबार लोकसभावार जातीय समीकरण छाप देते है. अब रोटी ,रोजगार,सड़क,बिजली पानी सब गए तेल लेने जातिया लड़ने लगी चुनाव।
जब आप जाटव के दरवाजे जाते है वो आपने को इक पार्टी का समथक मानते है, यादव के गाव में दूसरी पार्टी का समर्थन. ब्राहण के गाव में तीसरे दल को. उन लोगो का क्या करे जिनकी जातियो की कोई पार्टी नहीं है.
प्रोग्राम देख कर ये ही लग  रहा है राजनीति में नीतिया नहीं जातियों की अाबादी मायने रखती है.
लोहिया की क्या जात है शायद ही किसी ने ध्यान दिया हो, अगर गाँधी , जेपी जाति के नेता होते तो हिंदुस्तान की दूसरी तस्वीर होती.


 


चाहता हु आँखे बंद कर लू और छुप जाऊ. कोई न टोंके ना ही कोई कुछ पूछे।
क्या ऐसा संभव है ? 
जिस सवाल का जवाब न हो हमारे पास वो सवाल पैदा ही क्यों हो.