Friday, May 9, 2014

बड़ी नदी, बड़े लोग और छोटी नदी ,छोटे लोग

बड़ी नदियों का अपना इतिहास रहा है .लोग बाग़ बसते गए शहर बसता गया. जब पानी का स्रोत नदिया ही थी तब  सुबह  नदियों के किनारे शाम नदियों के किनारे. यही घाटो के विकास की कहानी बताते है जितना  पुराना शहर उतने पुराने घाट. स्नान के बाद ध्यान की जरूरत ने घाट के पास छोटे बड़े मंदिरो का विकास हुआ. धीरे शहर फैलता गया घाट ऐतिहासिक बनते गए.
आज फिर नदी घाट चर्चा में है . न मो की वजह से या ऐ के की वजह से, लेकिन फिर इक बार नदी , घाट, या यु कहे बनारस चर्चा में है .
बहुत बिचित्र बात है जितने भी देव हुए इन बड़ी नदियों के किनारे . राम सरयू के किनारे, तो कृष्णा यमुना के किनारे और तो और महादेव ने गंगा किनारे अपनी नगरी बसाई. बड़ी नदियों  बड़ी गाथाये और इन्ही के बीच देवताओ ने अपने अस्तित्व तो व्यापक बनाया.
राम कृष्णा और महादेव के वजह से ये नदिया इतनी महान बनी या इन नदियों के कारण  ये देव स्थापित  हुए, इनकी लीलाये सदियों तक सहेजे गयी, ये अपने आप में चर्चा का विषय है . लेकिन प्रशन तो ये उठता हही है की किन कारण से इन विभूतियों ने इन नदियों को अपनी कार्य स्थली  चुनी. अगर ये ही देवता गंडक , टोंस, राप्ती, गोर्रा, घाघरा और न जाने ऐसे कितने ही छोटी और चीनी मिल का सेवेर लाइन बन चुकी नदियों के किनारे अपनी उपस्थिति दर्ज करते तो ये नदिया अपना महत्व रखती. मगर ऐसा हो न सका, और इसके के लिए किसी देवता को दोष कैसे दे सकते है . भई वे तो देवता है उनका क्या , वे कही भी अपनी लीला करे.मगर यदि इनमे से किसी ने भी कबीर के तरह सहस दिखाया होता तो न जाने कितने शापित मगहर का तारण हुआ होता.
अगर ये साहस न मो ने या ऐ के ने दिखाया होता तो लोग सदियों तक मिसाल देते. प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार, वो भी जिसकी लहर चल रही हो, कही से लड़ता जो जीत ही जाता, फिर बनारस ही क्यों? थोड़ा सीना और चौड़ा कर के किसी छोटी नदी के किनारे पहुंचे होते तो उसका भी उद्धार हुआ होता.

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