Thursday, April 17, 2014

जब पत्रकार ही समाज को जातियों की सीमा में बांध कर रिपोर्टिंग करेगा तो जनता में ये भावना पहले से बलवती है. आप शायद इस भावना को और बढ़ाने में मदद कररहे है जाने या अनजाने ही.
लम्बा लेख नहीं लिखना चाहता, बस यही कहना चाहता हु की जितना पार्टियां जातीयता फैलाती है मीडिया का भी उतना ही रोल है. चुनाव के शुरू होते ही अखबार लोकसभावार जातीय समीकरण छाप देते है. अब रोटी ,रोजगार,सड़क,बिजली पानी सब गए तेल लेने जातिया लड़ने लगी चुनाव।
जब आप जाटव के दरवाजे जाते है वो आपने को इक पार्टी का समथक मानते है, यादव के गाव में दूसरी पार्टी का समर्थन. ब्राहण के गाव में तीसरे दल को. उन लोगो का क्या करे जिनकी जातियो की कोई पार्टी नहीं है.
प्रोग्राम देख कर ये ही लग  रहा है राजनीति में नीतिया नहीं जातियों की अाबादी मायने रखती है.
लोहिया की क्या जात है शायद ही किसी ने ध्यान दिया हो, अगर गाँधी , जेपी जाति के नेता होते तो हिंदुस्तान की दूसरी तस्वीर होती.


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