चुनावी चक्कलस में गहमर और लमही कुछ ओहींगा लागल
जैसे मई जून की दुपहरिया में आम के बगिया की छाव.
दुबे जी तो कमाल के व्यक्तित्व है.
आजुओ कुछ लोग बा जे बिना किसी मेवा के सेवा में लागल बा.
वार्ना गाव देहात में भी अब शहरी संस्कृति आ चुकल ह.
कुछ मिली तबे करब नाही त हमरा के कौन अकाज बा.
रवीश बाबू पूर्वांचल में ई गर्मी में माइक लेके गाव देहात में खाक छानत बाटे.
नीक लागल.
गहमर में अगर ६० सेकेंड अगर भोला नाथ गहमरी भी कवर होते त और मज़ेदार होत.
बाकी 50 मिनट में का का दिखावे.
अच्छा है.
जैसे मई जून की दुपहरिया में आम के बगिया की छाव.
दुबे जी तो कमाल के व्यक्तित्व है.
आजुओ कुछ लोग बा जे बिना किसी मेवा के सेवा में लागल बा.
वार्ना गाव देहात में भी अब शहरी संस्कृति आ चुकल ह.
कुछ मिली तबे करब नाही त हमरा के कौन अकाज बा.
रवीश बाबू पूर्वांचल में ई गर्मी में माइक लेके गाव देहात में खाक छानत बाटे.
नीक लागल.
गहमर में अगर ६० सेकेंड अगर भोला नाथ गहमरी भी कवर होते त और मज़ेदार होत.
बाकी 50 मिनट में का का दिखावे.
अच्छा है.