Wednesday, April 30, 2014

गहमर में प्राइम टाइम

चुनावी चक्कलस में गहमर और लमही कुछ ओहींगा लागल
 जैसे मई जून की दुपहरिया में आम के बगिया की छाव.
दुबे जी तो कमाल के व्यक्तित्व है.
 आजुओ  कुछ लोग बा जे बिना किसी मेवा के सेवा में लागल  बा.
वार्ना गाव देहात में भी अब शहरी संस्कृति आ चुकल ह.
कुछ मिली तबे करब नाही त हमरा के कौन अकाज बा.
रवीश बाबू पूर्वांचल में ई गर्मी में माइक लेके गाव देहात में खाक छानत बाटे.
नीक लागल.
गहमर में अगर ६० सेकेंड  अगर भोला नाथ गहमरी भी कवर होते त और मज़ेदार होत.
बाकी 50  मिनट में का का दिखावे.
अच्छा है. 

Wednesday, April 23, 2014

इस चुनाव में सोच रहा हु दंखिणपंथी बन जाऊ.
बहुत महगाई है, बहुत बेरोजगारि. 
बहुत कोशिश भी की.
नहीं बन प् रहा.
जब भी देखता हु रजत शर्मा को भावी प्रधानमंत्री को महामहिम बनाते तो संघी नही बन पता.
आज का युवा  बदलाव चाहता है, मै  भी युवा हु  मै भी बदलाव चाहता हु. लेकिन कैसे बदल जाऊ.
मेरा  भावी नेता बहुत डरपोक है, 
शायद उसकी वजह से ही मै बदल नहीं पा रहा.
कल ABP NEWS पे मोदी को तीन पत्रकारों के सामने GHOSNAPATRA में देखा।
बहुत दुःख हुआ, मेरा भावी नेता जिसके लहर में मैं बाप दादा की तालीम छोड़ संघी बनने चला था वो 3 से ज्यादा पत्रकार लोग से डरता है.
यही सवाल मैंने अपने संघी मित्र से किया, जवाब था रजत के प्रोग्राम में तो पब्लिक थी.
मैंने मन में कहा पब्लिक थी या पार्टी कार्यकर्ता जो हर हर मोदी कह रहे थे.
लेकिन मैं ये कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
वरना लोग बाग़ मेरे को आप का समर्थक  मान बैठेंगे।
भैया जगदम्बिका पाल जी से सिखने पड़ेगा 30  साल कांग्रेस का झंडा ढो कर संघी कैसे बनते है.


Thursday, April 17, 2014

जब पत्रकार ही समाज को जातियों की सीमा में बांध कर रिपोर्टिंग करेगा तो जनता में ये भावना पहले से बलवती है. आप शायद इस भावना को और बढ़ाने में मदद कररहे है जाने या अनजाने ही.
लम्बा लेख नहीं लिखना चाहता, बस यही कहना चाहता हु की जितना पार्टियां जातीयता फैलाती है मीडिया का भी उतना ही रोल है. चुनाव के शुरू होते ही अखबार लोकसभावार जातीय समीकरण छाप देते है. अब रोटी ,रोजगार,सड़क,बिजली पानी सब गए तेल लेने जातिया लड़ने लगी चुनाव।
जब आप जाटव के दरवाजे जाते है वो आपने को इक पार्टी का समथक मानते है, यादव के गाव में दूसरी पार्टी का समर्थन. ब्राहण के गाव में तीसरे दल को. उन लोगो का क्या करे जिनकी जातियो की कोई पार्टी नहीं है.
प्रोग्राम देख कर ये ही लग  रहा है राजनीति में नीतिया नहीं जातियों की अाबादी मायने रखती है.
लोहिया की क्या जात है शायद ही किसी ने ध्यान दिया हो, अगर गाँधी , जेपी जाति के नेता होते तो हिंदुस्तान की दूसरी तस्वीर होती.


 


चाहता हु आँखे बंद कर लू और छुप जाऊ. कोई न टोंके ना ही कोई कुछ पूछे।
क्या ऐसा संभव है ? 
जिस सवाल का जवाब न हो हमारे पास वो सवाल पैदा ही क्यों हो.